Sunday, 20 May 2012

लोकसभा में बही गंगा की धारा



पिछले दिनों गंगा के विषय पर लोकसभा में नियम 193 के तहत एक विशेष चर्चा का आयोजन हुआ. गंगा के  सांस्कृतिक, अध्यात्मिक, ऐतिहासिक महत्व और उसके प्रासंगिकता पर बहस में भाग लेने वाले सभी दलों के सदस्यों ने अपनी दलीय सीमा से परे जाकर अपना पूर्ण समर्थन जताया . गंगा के अविरलता और निर्मलता के विषय ने न केवल सारे सदन को एक सूत्र में पिरोने का काम किया बल्कि पूरब,पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के सांसदों द्वारा गंगा में बढ़ते प्रदुषण और उसके मायके में ही बांध बनाकर समाप्त करने पर उठी चिंता ने सदन व देश  का ध्यान इस महत्वपूर्ण विषय पर दिलाया. 


एक तरफ जहां सदस्यों की तरफ से बस एक ही आवाज़ आ रही थी---
" गंगा हमारी पहचान है, हमारी अस्मिता और ऐतिहासिक समृद्धि की प्रतिक है. गंगा की दुर्दशा अब सहने योग्य नहीं है. गंगा कि निर्मलता और अविरलता सुनिश्चित करने हेतु सरकार जल्द से जल्द करवाई करे."  
                
वही दूसरी ओर केंद्र सरकार की तरफ से नकारात्मक व्यवहार और टिप्पणियां देखने को मिली . सदन में हुए चर्चा का जबाब देते वक़्त पर्यावरण मंत्री की मज़बूरी और विषय के प्रति उनकी असहायता एक बार फिर साफ़ जाहिर हुई. बांधों के प्रति उनकी दृष्टि कि --"मात्र 70 बांध बन रहे है " कहकर विषय की महत्ता और गंगा के प्रति अपने व केंद्र सरकार की उपेक्षा का भाव प्रकट किया. अगर बांध सही है तो फिर गंगा के दुर्दशा प्रति घड़ियाली आसूं बहाना कतई सही नहीं है . देश गंगा चाहता है . देश में सदियों से बहती गंगा सिर्फ नदी नहीं बल्कि जीवंत सांस्कृतिक पहचान है . करोड़ो लोग  गंगा की वजह से सुखी संपन्न है . क्या सिर्फ भौतिक और चंद लोगों के सुख सुविधा खातिर गंगा की बलिदानी दी जा सकती है ?   
   गंगा के मुद्दे पर काफी जागरूकता पिछले दिनों में देखने को मिली है फिर भी लगता है गंगा के प्रति संवेदना जगाने में अभी और प्रयासों की आवश्यकता है, लेकिन इस बहस ने इतना तो जरुर ही किया कि गंगा के विषय पर सदन के साथ साथ देश का भी ध्यान खिंचा तथा इस महत्वपूर्ण विषय पर एक राय बनाने व गंगा मैया को बचाने की दिशा में एक उच्चस्तरीय प्रयास हुआ. 
आशा है आनेवालें दिनों में गंगा को लेकर समाज और सरकार जरुर कोई प्रभावी कदम उठाएंगे. विश्वास है कि इस महत्वपूर्ण विषय पर अपना सद्भाव रखने वालें लोगों के प्रयास और गंगा की अविरलता और निर्मलता के मुद्दे पर कुछ सकारात्मक करने को संकल्पित जनमानस के समर्थन से गंगा अपने पुराने स्वरुप में वापस लौटेगी ..

Tuesday, 24 April 2012

जंगल की आवाज़ सुनो

बड़ी तकलीफ होती है जब अपने पाँवों के नीचे की जमीन सुलगती है। लेकिन उनका क्या जिन्हें सुलगते आग के दर्द को दिन-रात झेलना पड़ता है। उनकी व्यथा कौन समझ सकता है जो अपनी जुबान से अपने ऊपर बीत रही जुल्मों सितम बयान नहीं कर सकते। जो अपनी दर्द को किसी से साझा भी नहीं कर सकते और अपनी जिन्दगी आग को समर्पित करने पर मजबूर है।
जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ जंगलों में लगने वाली आग की विभीषिका की और उस आग की तपिस में झुलसते वन्य प्राणियों की। गर्मी का मौसम शुरू होते ही देश के जंगलों में आग धधकने प्रारंभ हो गये है। पिछले कुछ दिनों दिनों में उत्तराखंड, झारखण्ड, छत्तीसगढ़  के जंगलों में लगातार आग लगने की घटनाये बढ़ गयी है, जिसकी जानकारी समाचार पत्रों के माध्यम से आये दिन हमें मिल रही है।

उत्तरखंड में अभी तक अकेले 21 अप्रैल को राज्यभर में आग लगने की 110 घटनाएं हुई। इसमें करीब 162 हेक्टेयर  से अधिक  जंगल राख हो गए। झुलसने वाले वन क्षेत्रों में 105 हेक्टेयर रिजर्व फारेस्ट में है जबकि 57 हेक्टेयर राजस्व व वन पंचायतों के अधीन आने वाला क्षेत्र है। 15 फरवरी के बाद शुरू हुए फायर सीजन में अब तक 450 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें करीब एक हजार हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। अकेले रिजर्व फारेस्ट में ही छह सौ हेक्टेयर से अधिक जंगल आग की भेंट चढ़ गए हैं।  22 अप्रैल रविवार सुबह रुद्रप्रयाग स्थित पुनाड़ के निकट चीड़ के जंगलों में आग लग गई जिसने विकराल रुप धारण कर पेड़-पौधे और वनस्पतियों को राख कर दिया। इसी तरह कार्बेट टाइगर रिजर्व के बिजरानी क्षेत्र में, जहां बाघ व हाथी बहुतायत क्षेत्र में वास करते है, २१ अप्रैल को दिन भर धधकती रहीद्य बीते कुछ दिनों से नैनीताल क्षेत्र में ओखलकांडा के कुलौरी, देवस्थल के नीचे, अलपौनीखाल व सुरंग गांव के चीड़ वनों में भी आग धधक रही है। बदरीनाथ वन प्रभाग के अंतर्गत लासी रांगतोली, गोपेश्वर के सोनला के अलावा बदरीनाथ वन प्रभाग के नंदप्रयाग रेंज के अंतर्गत जैंती, कोट, कंडारा और हड़कोटी, अल्मोड़ा के विकास खंड के मोहान से लगे मछोड़, टोटाम व सौराल के पास भी बीते कुछ दिनों से जंगल के धू-धू कर जलने की सूचनाये मिल रही हैं।
                      ये तो बात हुई उत्तराखंड के जंगलों की| जब हम झारखण्ड के जंगलों की सुध लेते है तो पाते है की हजारीबाग के गौतम बुद्ध वन्य प्राणी आश्रयणी क्षेत्र के महानेटांड के समीप वन में आग लग गई, जिससे लाखों के नुकसान हुए। यही हल लोहरदग्गा के जंगलों का भी है जो लगातार आग के चपेटे में आ रहा है।
इसी तरह छत्तीसगढ़ के दरभा से लेकर कोंटा तक के जंगल इन दिनों आग के चपेट में है। आग लगने का नजारा १० मार्च को कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में भी देखा गया था। तीरथगढ़ के समीप घने जंगलों भी भीषण आग के विध्वंस को झेल चूका है। इस आग के चपेट में आने से हजारों छोटे पौधे जलकर राख हो गये। खासतौर से तेंदूपत्ता के उत्पादन पर इसका भारी असर पडने के आसार है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान ही नहीं तोंगपाल, सुकमा, दोरनापाल, कोंटा के जंगल भी आग के चपेट में आने से पुरी तरह से जल चुका है।कुल मिलकर पूरा बस्तर ही आग की चपेट में है। इसी तरह यवतमल (पूर्वी महाराष्ट्र) के तिपेश्वर अभयारण्य के वन क्षेत्र में बीते दिनों से आग लगने की घटनाये सामने आई थी।

यह पहली बार नहीं हो रहा है कि वहां के जंगलों में आग लगी हो। हर वर्ष ऐसी घटनाये इन प्रदेशों के जंगलों के लिए आम बात सी हो गयी है। हर वर्ष आग लगने से करोड़ों की वन्य संपदा को नुकसान पहुचता है लेकिन सबसे ज्यादा कष्ट किसी को पहुँच रहा है तो वह है उन जंगलों के निवासी, बेजुबान वन्यप्राणी। जंगलों में आग लगने से वन्य-प्राणी कराहने को मजबूर है और खामोश होकर संकटों से सामना कर रहे है।  वो टकटकी लगाये इस उम्मीद में स्थानीय लोगो के पास भागे चले आते है कि हमें आग से बचाओ लेकिन इनकी आवाज को सुनने की वजाए खतरा समझकर इन्हें मार दिया जा रहा है।
ऐसी हालत में उम्मीद की किरण स्थानीय जनता से जागने की आशा की जानी चाहिए थी लेकिन जंगलों पर निर्भर स्थानीय समाज भी खामोशी से सारी घटनाओं को एक तमाशे की तरह देख रहा है और कही कही इन आग को लगाने वालों में भी शामिल पाता देखा जा रहा है। उत्तराखंड में नयी घास उगाने, पेड़ काट कर उसके  निशान मिटने के चक्कर में लोग जंगलों में आग लगा रहे है तो झारखण्ड के लोहरदग्गा में महुआ चुनने के चक्कर में जंगल आग की भेट चढ़ रहे है।
सरकार के तरफ से जंगलों में आग लगने से रोकने के सन्दर्भ में कोई ठोस करवाई भी नहीं होती। बस औपचारिकता निभाई जाती है। देश में वनों का प्रतिशत कुल क्षेत्रफल के मुकाबले 33 फीसदी अनिवार्य घोषित करने वाली वर्ष 1988 की वननीति के बाद भी वनों के खत्म होने की मुख्य वजह बनी, वन की आग का प्रकोप जारी है। देश में 6,75,538 वर्गकिलोमीटर में जंगल होने के दावे होते रहे हैं। यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 20.55 प्रतिशत ही है। इनको और फैलाने और 45 हजार प्रकार की वनस्पतियों को बचाए रखने की चुनौती सरकार के सामने है लेकिन सरकार और सरकारी पदाधिकारियों(वन पदाधिकारी) के रुख से यह जाहिर हो जाता है कि उनकी भी मंशा सही नहीं है। जब जंगलों में आग लगती है तो सुचना देने के घंटों बाद वन्य कर्मी आग बुझाने के उपकरण के साथ पहुचते है। हर जगह से एकसमान शिकायत मिलती है कि वन्य कर्मी सक्रीय, सजग नहीं रहतेद्य वही दूसरी ओर स्थानीय जनता का भी अपेक्षित सहयोग आग बुझाने में नहीं मिलती। ऐसे में लगता है सरकारी लालफिताशाही और आम जनता के उपेक्षा का शिकार पूरा जंगल हो गया है।
पुरे घटनाक्रम को नजदीकी से देखने, परखने पर पता चलता है कि आग लगने की घटनाये हर वर्ष होती है लेकिन कटु सच्चाई यह है कि सरकार के पास न आग लगने से पहले और न ही आग लगने के बाद के लिए कोई रणनीति या उचित प्रबंध है।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या जानवरों को इसी तरह मरने दिया जाना चाहिए या कुछ करने भी चाहिए? जीवन जीना जिस तरह मनुष्य को अच्छा लगता है उसी तरह उन जानवरों को भी अपनी जिन्दगी जीना जरुर पसंद होगी। जीने का अधिकार आम आदमी को तो है लेकिन क्या हम उनके लिए भी कुछ ऐसा ही उपाय कर सकते है? क्या हमें उन बेजुबानों के प्राण पर जो संकट के बादल छाये हुए है, उन्हें हटाने हेतु कुछ नही करने चाहिए ? आम जनता को तो कभी जयप्रकाश, कभी अन्ना तो कभी रामदेव मिल जाते है जो आम जन के जीवन से जुड़ी समस्याओं के समाधान हेतु जननायक बनते है। क्या उन बेजुबान वन्य प्राणियों  की आवाज, जो हर वर्ष बाकि विषयों के शोर-गुल में दब जाती है, उनके लिए किसी को "वन नायक" नहीं बनने चाहिए। वो न तो वोटर है और न ही विकास के भूखे आधुनिक मनुष्य को विकसित करने में योगदानकर्ता, ऐसे में आखिर कौन सुनेगा उनकी आवाज?

Tuesday, 6 March 2012

अंग्रेजी की भेट चढ़ती ग्रामीण प्रतिभा

एम्स में मेडिकल छात्र अनिल, अंग्रेजी की भेट चढ़ गया | अनिल का सिर्फ इतना दोष था कि उसको इंग्लिश ठीक से नहीं आती थी| उसके हौसले बुलंद थे जिससे  वह देश के सर्वोच्च मेडिकल संस्थान में दाखिला लेने में सफल रहा लेकिन उसकी प्रतिभा अंग्रेजी की काली छाया से उबर नही पायी और उसकी मौत की भी वजह बनी| वह लगातार अंग्रेजी बढि़या नही होने के कारण फेल हो रहा था और भविष्य की चिंता में तनावग्रस्त होकर अंततः आत्महत्या करने पर मजबूर हो गया|
भारत में एक अनिल ही नही बल्कि न जाने कितने अनिल इसी कातिल अंग्रेजी से पढाई के दौरान जूझ रहे है और अपने अस्तित्व व सुनहरे भविष्य के राह में रोड़ा अटकाते अंग्रेजी की बाधा को हटाने हेतु संघर्ष कर रहे है|

समस्यायों से लगातार जूझते छात्र

कक्षाओं में अंग्रेजी में लेक्चर होती है तो पढाई की सारी सामग्री भी अंग्रेजी में ही मिलती है। हिंदी माध्यम की किताबे भी पुस्तकालय में नहीं दिखती बल्कि वह अंग्रेजी की किताबो से भरी होती है। संयोगवश कुछ किताबें भी देखने को मिल जाये तो वह काफी पुरानी संस्करण होती है तथा आवश्यकता के अनुरूप नहीं होती।  ऐसी स्थति कानून के विद्यार्थी की हैसियत से मैंने व्यक्तिगत और प्रत्यक्ष तौर पर  दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों में देखा है जहाँ हिंदी की पुस्तकें काफी कम संख्या में उपलब्ध है। हिंदी माध्यम से आने वाले छात्रों को सही सूचनाये भी हिंदी में नहीं मिल पाती, क्यूंकि सारी सूचना सम्बन्धी पत्रक भी अंग्रेजी में ही नोटिस बोर्ड पर टंगती है| अंग्रेजी की वजह से मानसिक प्रताड़ना भी होते देखने को मिलती है| अंग्रेजी स्कूल के बच्चे स्वभावत: हिंदी स्कूल से जाने वाले टैलेंटेड बच्चों को नजरअंदाज करते हैं और शिक्षक भी कई बार उनसे समान व्यवहार नहीं रखते। अंग्रेजी न जानने वाले छात्र अपने साथियों के बिच भी अंग्रेजी की वजह से उपहास का पात्र बन जाते  है और कुंठित होकर दोस्ती करने में भी हिचकिचाते है। नतीजा यह होता है कि धीरे-धीरे ऐसे बच्चे अपने को बाद बाकि बच्चो से अलग कर लेते हैं और कई मामलों में घोर निराशा के शिकार हो जाते  हैं, जिसकी परिणति आत्महत्याओं में होती है। मामला यही तक सिमित नहीं है बल्कि कई और अन्य प्रकार की समस्यायों को जन्म देती है । 
अंग्रेजियत की आंधी में धूल धूसरित होती ग्रामीण प्रतिभा

अंग्रेजी के इस कुप्रभाव की सबसे ज्यादा शिकार ग्रामीण पृष्ठभूमि में पढ़े बच्चे हो रहे है| समस्यायों से दिन-रात जूझते व 70 फीसदी ग्रामीण आबादी से सम्बन्ध रखने वाले मिट्टी के लालों की योग्यता  आज अंग्रेजी की आंधी में धूल धूसरित होती जा रही है| अंग्रेजी की प्राथमिकता की वजह से न केवल ग्रामीण प्रतिभा कुंठित होती जा रही है, बल्कि उसकी योग्यता भी उचित स्थान पाने में सफल नही हो पा रही|

गाँव और छोटे शहरो में हिंदी माध्यम से पढने वाले छात्रों की अच्छे संस्थानों में नामांकन लेने का सपना होता हैद्य अभावों से जूझते व गाँव की गलियों में दियें जलाकर पढाई करने वाला विद्यार्थी  अपने मेहनत के बल पर प्रवेश परीक्षाये देता है| जब वह नामी गिरामी शिक्षण संस्थानों में नामांकन के अपने सपनो को पूरा होते देखता है तो उसके आँखों में एक अजीब सी उत्साही चमक आ जाती है| सफलता के असमान में उड़ान भरने वाली मानो उसे पंख मिल जाते है| माँ, पिताजी के सपनो में समाज व देश की सपनो को पूरा करने का अवसर मिलने के रूप में वह इसे लेता है| लेकिन उसकी खुशी उस समय मायूशी में बदल जाती है जब अंग्रेजी के प्रभाव के कारण उसे हर प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है| बड़ी संख्या में छात्र ग्रामीण इलाकों से आते है जिनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं होती| ये अंग्रेजी समझ तो सकते हैं लेकिन जब प्रोफेसर बोलते हैं तो इनकी बात समझ में नहीं आतीद्य अगर छात्र क्लास में अंग्रेजी के अल्प जानकारी होने की बात बोलता है तो वो खुद को अपमानित महसूस करता है|

        अधिकांशतः हिंदी माध्यम से आने वाले छात्रों की हिंदी के साथ साथ  सम्बंधित विषय पर भी पकड़ होती है लेकिन सिर्फ अंग्रेजी की वजह से उनकी प्रतिभा को बेकार समझ लिया जाता है| अंग्रेजी के कारण तनाव झेल रहे छात्रों के लिए काउंसलिंग की कोई प्रणाली  भी अमूमन नहीं होती है, जिस कारण तनाव में घिरे छात्र पूरी तरह से अवसाद में चले जाते हैं और अंततः आत्महत्या करने को प्रेरित होते है| देखने में आता है की प्रशासन ऐसी समस्यायों के प्रति संवेदनशील नहीं रहता|


अंग्रेजी के वर्चस्व के लगातार प्रयास

कुछ दिनों पहले प्रशासनिक  सेवाओं में भी हिंदी की स्वीकार्यता को समाप्त कर अंग्रेजी के प्रभुत्व को स्थापित करने की कोशिश हुई| हाल में आइआइटी में भी सीबीएसइ के छात्रों को अंकों के मामले में तरजीह देने कि बात की गयीद्य नए प्रावधान के मुताबिक बारहवी के अंक अब ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे  और छात्रों द्वारा बारहवी में प्राप्त अंक आइआइटी में नामांकन के निर्धारण के समय 40% तक मायने रखेंगे| ऐसे में स्वाभाविक है की फिर एक बार ग्रामीण छात्र ही इससे प्रभावित होंगे क्यूंकि अधिकांश राज्य बोर्डों की परीक्षाये देते है जहाँ अंक कम मिलते है| इस फैसले के कारण अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र ही इंजिनियर बनने का ख्वाब पूरा कर पाएंगे| इस प्रकार के फैसले और हिंदी  सहित तमाम क्षेत्रीय भाषाओं की विरोधी  प्रवृति के पीछे ग्रामीण योग्यता को नकारने व सर्वोच्च पदों तक उन्हें नहीं पहुचने देने की साजिश चलने की गंध आ रही है|


मातृभाषा में हो क्लास

अगर विद्यार्थी हिंदी में पढ़कर अच्छे संस्थानों के प्रवेश परीक्षाओं को पास कर सकता है फिर वैसे में छात्रों की आगे की पढाई का भी इंतजाम होना चाहिए ताकि मात्र भाषाई दिक्कत्तों से आत्महत्या जैसे प्रयास करने को छात्र मजबूर न होने पाए| शिक्षण संस्थानों की यह जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाये की वह उनके पढाई के माध्यम का भी ख्याल रखे| अनिल ने एम्स की अंडरग्रेजुएट प्रवेश-परीक्षा में हिंदी भाषा में अपने उत्तर लिखे थे। अगर अभ्यर्थियों के चयन में हिंदी माध्यम स्वीकार्य है तब रेगुलर क्लासेज में क्यों नहीं हो सकती ?  अंग्रेजी के जो क्लास चलाये जाते है अगर वह विद्यार्थियों के लिए नाकाफी है तो फिर अंग्रेजी में ही पढ़ाने की जिद क्यूँ ? क्यूँ न विद्यार्थिओं को उनके मातृभाषा में ही पढाया जाये ? हमें लगता है कि इसपर कोई अप्पत्ति भी नहीं होने चाहिए| यह निर्णय संविधान के निर्धारित मापदंडो के दायरे में होगा और इसे राजभाषा हिंदी के सम्मान के रूप में देश व समाज देखेगा|


शिक्षकों द्वारा शुरू हो पहल 
भारत में पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले 75% शिक्षक भारतीय है और एक राजभाषा के तौर पर हिंदी के सामान्य ज्ञान से सबका परिचय होता है| ऐसी मानसिकता विकसित करने के प्रयास हो जिससे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़कर निकले छात्रों को अंग्रेजी से परेशानी महसूस न हो, जैसे- क्लास के दौरान उनको सवाल उनकी मातृभाषा में पूछने को प्रोत्साहित करना व उनके द्वारा पूछे गये सवाल का जबाब उन्ही की भाषा में देने की कोशिश करना ताकि अंग्रेजी की समस्या से जूझना न पड़े और प्रतिभा भाषाई बोझ के तले दबे न रहे| कॉलेजों में प्रोफेसर इतने प्रशिक्षित हों कि वे हिंदी भी अंग्रेजी के साथ पढ़ा सके और बच्चों की जिज्ञासाएं हिंदी भाषा में शांत कर सके|

भाषा सुधार हेतु खोले जाये भाषा विकास केंद्र

वर्तमान में देश में 13.62 लाख प्राथमिक व उच्चतर प्राथमिक विद्यालय है | इनमे से लगभग 53%(7,19,387) स्कूलों में हिंदी माध्यम से शिक्षा दी जा रही है जबकि मात्र 11.7%(1,58,866) स्कुल अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्रदान करते है| अब ऐसे में अगर किसी ने स्कूल तक हिंदी या तमिल में पढ़ाई की है और उसे अंग्रेजी ठीक से नहीं आती तो ये उसकी कमजोरी नहीं है| सरकार को ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए कि ऐसे छात्रों के लिए स्कूलों में अंग्रेजी सिखाने का प्रावधान हो|  हर शैक्षणिक संस्थान में भाषा विकाश केंद्र खोला जाये| क्षेत्रीय भाषाओं के साथ साथ विशेष रूप से हिंदी भाषा के जानकार लोगो की उसमे नियुक्तिया हो| इससे भाषा सुधार में मदद मिलेगी| विदेशी विश्वविद्यालयों से हम इस मामलों में सिख ले सकते है जहाँ टॉफेल जैसे परीक्षाएं लेकर छात्रों को उनकी भाषाई ज्ञान आँका जाता है| छात्रों को यह पता रहता है की हमारी भाषाई कमी कितनी है

दुसरे देशों के अनुभव
भारत कहने को अपने को उभरती हुई महाशक्ति बताता है और विकशित देश होने के पथ पर अग्रसर बताता है| फिर क्या भारत बिना भाषा की समृद्धि से समृद्ध हो जायेगा ? क्या भारत सिर्फ अंग्रेजी से ही महान देश बन जायेगा ? कतई नहीं , क्यूंकि आकडे और वास्तिविकता कहती है की जो देश विकशित हुए है अपनी भाषा की समृद्धि की वजह से हुए|  क्या वजह है कि चीन ने पिछले 20 सालों में भारत को उच्च शिक्षा के मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है| चीन में भारत से पांच गुणा उच्चस्तरीय शोध-पत्र  निकलता हैं|  चीन ऐसा कर पाने में इसलिए सफल हुआ क्यूंकि उसने अपनी शिक्षा पद्धति अपनी मातृभाषा में विकशित कीया| भारत में अभी प्रति वर्ष 6000 पीएचडी छात्र करते है जबकि चीन में जहाँ 1993 तक 1900 पीएचडी प्रतिवर्ष होते थे, आज 22000 पीएचडी करने वाले छात्र है| उच्च शिक्षा में जहां भारत चीन और मलेशिया सरीखे देशों से एक जमाने में काफी आगे होता था आज काफी पीछे चला गया है। भारत का सकल-पंजीकरण अनुपात अभी भी महज 13.5 फीसदी है जबकि अमेरिका का  81.6, चीन का 22.1 व मलेशिया का 27 प्रतिशत है। जापान, रूस आदि देश भी अपनी भाषा के विकास से विकसित हुए जो पुरे दुनिया के सामने आज उदहारण बने हुए है| इसलिए समय की मांग है की अपनी भाषा को सरल, सुगम, सर्वव्यापी बनाया जाये| सहजता से पढ़ने, बोलने लायक हिंदी भाषा को पढाई का माध्यम बनाने में कोई आपत्ति भी  किसी को नहीं होने चाहिए द्य अच्छा डॉक्टर बनने के लिए विषयज्ञान (चिकित्सा विज्ञान) जरूरी है न की भाषाज्ञान (अंग्रेजी ज्ञान)द्य अंग्रेजीदां लोगों ने एक दुष्प्रचार कर रखा है कि अंग्रेजी ज्ञान और विकास की भाषा है द्य हकीकत यह है कि ज्ञान और विकास का किसी भाषा विशेष से कोई संबंध नहीं होता और भाषाज्ञान की तुलना में विषयज्ञान ज्यादा जरूरी चीज है| यह कितनी बड़ी मानवीय विडम्बना का विषय है कि भाषा जिसे सिर्फ संप्रेषण का माध्यम होना चाहिये था हमारे समाज में वर्चस्व का प्रतीक हो गया है और जिसकी अज्ञानता से किसी की जान तक जा सकती है द्य
                                          साथ ही साथ हिंदी में किताबे पुस्तकालयों में  प्रचुरता  व आसानी से उपलब्ध होने चाहिए द्य शैक्षणिक संस्थानों को अपने ऊपर यह दायित्व लेने के लिए सरकार को प्रोत्साहित और निर्देशित करना चाहिए की वह विश्व की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों का अनुवादित संस्करण अपने छात्रों को मुहैया कराए|

हिंदी के सम्मान में अंग्रेजी का विरोध नहीं

विश्व के सर्वमान्य प्रचलित संपर्क भाषा के रूप अंग्रेजी का सम्मान किया जाना चाहिए द्य एक भाषा के रूप में उसका अध्ययन करना चाहिए और उसका ज्ञान भी होना चाहिए| अंग्रेजी की जानकारी आज की जरुरत है लेकिन अंग्रेजी को जबरदस्ती थोपने की नीति कितना जायज है इस पर व्यापक विचार विमर्श की आवश्यकता है| यह अंग्रेजी का वर्चस्ववादी डरावना रूप है, जहाँ कोई होनहार और प्रतिभाशाली छात्र हिंदी माध्यम से कामयाबी का सफर तय करने के बावजूद अंग्रेजी के औसत ज्ञान के कारण फिसड्डी और असफल मान लिया जाता है|             
             ऐसे समय में जब भारत को उच्च शिक्षा के सर्वोत्कृष्ट स्थति में पहुँचाने के लिए सरकार लगातार नए नीतिया बना रही है तो कम से कम देश की जमीनी हकीकत को भी ध्यान में रखने की जरुरत है। अधिकांश भारतीय छात्र अपने राह में अंग्रेजी को रोड़ा न माने, इसके लिए सरकार को मजबूत इरादे से प्रयास करने चाहिए। विश्वविद्यालयो में अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी के व्यापक प्रचार और विस्तार के साथ साथ हिंदी माध्यम से पढने आए छात्रों के लिए भाषाई दिक्कतों को दूर करने के लिए उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था करना जरुरी है| साथ ही साथ अंग्रेजी के प्रति पूर्वाग्रह वाली सोच भी हमें बदलनी पड़ेगी ताकि अंग्रेजी कुंठा अनिल के साथ साथ अनेक प्रतिभाओं की अकाल मौत के लिये जिम्मेवार न बने| यह प्रश्न आज हर भारतीय के मन में उठने चाहिए कि .क्या अंग्रेजी कम जानने वाले ग्रामीण अंचलों के छात्रों को नीची नजर से देखा जाना चाहिए?  क्या उनकी प्रतिभा का मजाक उड़ाना सही है ? क्या इससे ग्रामीण भारत में असंतोष का भाव एक नए क्रांति के रूप में प्रस्फुटित नहीं होगा ? वक्त इन सवालों के साथ त्वरित जबाब भी चाहती है|
अंग्रेजियत की विनाशकारी प्रवृति ने प्रतिभाशाली छात्रों की योग्यता को कम करके आंकने का काम किया है जिसके कारण हताश और निराश मातृभाषा आज अपने लिए कुछ करने का आग्रह सरकार और समाज से कर रही है ताकि उसके लाल अपनी प्रतिभा की लालिमा बिखेर सके और भारत की समृद्धि में अपना योगदान दे पाए|

Tuesday, 21 February 2012

आइआइटी परीक्षा मे सुधार के नामपर ग्रामीण प्रतिभा को कुचलने की साजिश

कुछ दिनों पहले यूपीएससी की परीक्षा में अंग्रेजी को अनिवार्य विषय बनानेवाली फैसलें लेकर सरकार ने ग्रामीण पृष्टभूमि, विशेषकर हिंदी भाषी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के अधिकारी बनने के सपनों को कुचलने का काम किया था | अंग्रेजी को अनिवार्य करने वाली उस फैसले ने हिन्दीभाषी गरीब छात्रों के पढ़ लिखकर आगे बढ़ने के उत्साह को निराशा में बदल डाला था | इस फैसलें से विद्यार्थी उबरने की कोशिश ही कर रहे थे कि सरकार एक और फैसला आइआइटी की गुणवत्ता सुधारने के नामपर करने जा रही है, जिसका मकसद  ग्रामीण क्षेत्रों से आने वालें विद्यार्थिओं के इंजिनियर बनने से रोकना है | केंद्र सरकार द्वारा आइआइटी  एवं अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग कालेजों में नामांकन के लिए एक नये प्रस्ताव तैयार किये जा रहे है, जिसमे आइआइटी के चयन प्रणाली में सीबीएसई के अंकों को 40 प्रतिशत तरजीह देने का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही आइआइटी में नामांकन के लिए अब छात्रों को दो परीक्षा भी देनी होगी। आइआइटी की नयी चयन प्रणाली के लागु होने से छात्रों में ट्यूशन की प्रवृति बढ़ेगी एवं आइआइटी में नामांकन के लिए दो परीक्षा लेने से छात्रों पर दबाव भी बढ़ेगा। शिक्षा के व्यवसायीकरण को बढ़ावा देने वाली और ग्रामीण प्रतिभा को हतोत्साहित करनेवाली इन् सरकारी प्रस्ताव से ग्रामीण छात्रों का सर्वाधिक नुकसान होगा तथा वे सबसे ज्यादा प्रभावित भी होंगे। पुरे फैसले को गौर से समझने पर मालूम पड़ता है की कुकुरमुत्ते की तरह उग आए लाखों ट्यूशन मालिकों के गिरोह
द्वारा किये दबाब के मद्देनज़र इन प्रस्ताव को लाये गए है ।
                                 गाँव की प्रतिभाये अपने दम पर आगे आने लगी है जिसकी वजह से शहरी खाए पिए अघाए लोगो के बच्चे आइआइटी जैसी परीक्षाये पास नहीं कर पा रहे है| प्रतिभा को दरकिनार कर पैसे वालें और महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो को किसी भी तरह  इंजिनियर बनाने वाली मानसिकता इस फैसलें मे भी काम कर रही है, जो यू.पी.एस.सी. के मामले मे सरकार द्वारा लिए गए पिछले फैसलों मे भी देश ने देखा था | इसके पहले अंडे बेचकर, अख़बार बेचकर और अन्य तमाम आर्थिक संकटों को झेलते हुए भी ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे यू.पी.एस.सी. के कठिन परीक्षायों में अपनी मेहनत के बदौलत उतीर्ण हो जाते थे जबकि महंगे ट्युसन पढ़ने वाले अमीरों के बच्चे मुहं देखते रह जाते थे | फिर सरकार के मंत्री और वहां बैठे प्रसासनिक पदाधिकारियों ने गरीब किसानों के बेटों-बेटियों की आंख मे धुल झोकते हुए और तथाकथित प्रसनिक सुधार समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर अंग्रेजी को अनिवार्य बना डाला | गाँव से आनेवालें बच्चे अंग्रेजी के मामले मे थोरे ढीले पड़ जाते है जिसकी वजह से अब उन कुटिल मानसिकता के लोगो की आकांक्षाएं पूरी हो गयी जो किसानो, मजदूरो के बच्चो को उच्च पदों पर चयन होते देखना पसंद नहीं करते थे | इसी प्रकार की साजिश आइआइटी की चयन प्रक्रिया मे बदलाव करके फिर से दुहरायी जा रही है | इससे पहले भी आइ.आइ.टी. ने बारहवी में 60 प्रतिसत अंक को अनिवार्य बनाकर हजारों प्रतिभाशाली छात्रों के आइ.आइ.टी. जैसे संस्थानों में प्रवेश का रास्ता बंद कर दिया था | अगर सरकार को ऐसे कदम उठाने ही थे तो चयन प्रणाली में बदलाव लाने से पहले सभी राज्य  परीक्षा बोर्डों की मूल्यांकन प्रणाली को समान करनी चाहिए थी ताकि पुरे देश मे एक ही पद्धत्ति से विद्यार्थिओं को अंक प्रदान किये जाते| सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया इसका मतलब साफ है की इस फैसले का मकसद एक खास वर्ग को लाभ पहुचना था । प्रत्येक राज्य में मूल्याङ्कन पद्धत्ति अलग अलग है जबकि सी.बी.एस.ई. थोक मात्र में उदारता पूर्वक बोरे खोल के नंबर देता है | जब तक सीबीएसई एवं राज्य सरकार की मूल्यांकन प्रणाली समान नहीं होगी तबतक अधिकांश राज्यों को इसका नुकसान उठाना परेगा, जिसकी कीमत सुपर-३० जैसे संस्थानों में पढ़कर निकलनेवालें उन ग्रामीण बच्चों पर भी पड़ेगा जो आर्थिक संकटों की मार झेलने के बाबजूद इंजिनियर बनने का सपना देखते है और संस्थान की देखरेख में दिन रात मेहनत करते है। ऐसे लाखों बच्चे है जो 60-75 फीसदी अंक लाने के बाबजूद आइआइटी की रेस मे उन बच्चों से कही आगे है जिन्होंने 90 से 99 फीसदी अंक बारहवी की परीक्षायों में पाए है | सरकार को इस प्रकार की दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़नेवाली नीतियों को बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए था कि उसके फैसले ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र के छात्रों में भेदभाव तो नहीं पैदा कर रहा ? अगर उसके मकसद शहरी बच्चों को ही ध्यान में रख नीतियाँ बनाने का है तो यह विभाजनकारी नीतिगत फैसला है तथा इसका पुरजोर विरोध करने के साथ साथ कड़ी-से-कड़ी शब्दों में निंदा होनी चाहिए। मैं तमाम छात्र संगठनों, राजनितिक दलों और बुद्धिजीविओं से इस फैसले के ख़िलाफ अपना मत प्रकट करने तथा फैसले को वापस लेने हेतु सरकार पर दबाब बनाने की अपील करता हूँ | सरकार से भी आग्रह है की इस नकारात्मक प्रभाव पड़ने वाली फ़ैसले को तुरंत वापस ले तथा सभी राज्यों के बोर्ड की अंक प्रणाली एकसमान करें |

Wednesday, 15 February 2012

बलिदान का आह्वाहन करती गंगा

मनेरी बांध से आठ किमी बाद सुखी गंगा
इन दिनों धर्म नगरी हरिद्वार का "मातृ सदन" गंगा के अस्तित्व को बचाने और इसके अविरल प्रवाह को बाधित करने के ख़िलाफ लड़ाई लड़ रहे गंगाप्रेमियों का संघर्षस्थली बनी हुई है| गंगा को समर्पित और 1967 ई. में स्थापित यह वही जगह है जहा स्वामी निगमानंद ने गंगा के अस्तित्व को बचाने की खातिर अपने प्राणों की आहुति दी थी | प्रकृति की गोद में और गंगा के तट पर अवस्थित मातृ सदन, गंगा को बचाने के लिए लड़ाई लड़ने वालें एक केंद्र के रूप में जाना जाता है तथा अपने स्थापना समय से ही यह आश्रम लगातार सशक्त और प्रभावी संघर्ष कर गंगा को अतिक्रमण से बचाने में लगा हुआ है| यह आश्रम फिर से शासन प्रशासन व माफिया से लड़ाई लड़ने के साथ साथ अवैध खनन और अंधाधुंध व मनमाने तरीके से प्रदूषित की जा रही गंगा को बचाने के लिए ऐतिहासिक बलिदानी के संकल्प के साथ तप करने मे लगा है | आश्रम धर्म के नाम पर ढोंग रचने की वजाए आस्था के प्रत्यक्ष स्वरुप गंगा को बचाने के लिए हरसंभव काम कर रहा है जिससे गंगा अविरल प्रवाहित होती रहे | इसी कड़ी में गंगा को बचाने के लिए पहले भी संघर्ष कर चुके और गंगा के खात्मे के लिए बनायीं जा रही 650 करोड़ के लाहोरीनागपाला सहित 3 विद्युत् परियोजना को रद्द करवाने वालें प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. जी.डी. अग्रवाल, पिछले एक सप्ताह से अनशन कर रहे है| प्रो. अग्रवाल 12 बन रही बांधों को हटाने व 120 प्रस्तावित बांधों को निरस्त करने और गंगा की रक्षा के लिए सरकार से ठोस कदम उठाये जाने की मांग को लेकर 8 फरवरी से ही अन्न त्याग मातृ सदन मे गंगापुत्र निगमानंद की समाधी के समीप बैठकर अनशन कर रहे है और एक महीने के बाद जल त्यागने की घोषणा भी कर चुके है | "गंगा सेवा अभियानम" के तहत अनशन कर रहे प्रो. अग्रवाल गंगा में बढ़ते जल प्रदुषण, उत्तराखंड में चल रही विद्युत् परियोजनाओं के साथ साथ गंगा रक्षा के लिए सरकारी धन की लूट के बारे में पहले भी अनशन कर सरकार और समाज का ध्यान आकृष्ट करवाने का काम किया था | प्रो. अग्रवाल गंगा की दुश्मन बनने वाली बांधों के निर्माण रोकने और तमाम विद्युत् परीयोजनाओं को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले वर्ष भी अनशन पर बैठे थे | उसके बाद सकते में आई सरकार ने गंगा और प्रो. अग्रवाल की सुध लेते हुए तमाम परियोजनाओं को रद्द करने की बात भी कही थी । उस समय वित्त मंत्री और सरकार के प्रमुख रणनीतिकार प्रणब मुखर्जी द्वारा गंगा के सन्दर्भ में सरकार की नीतियों का उल्लेख करते हुए गंगा पर बन रही तीन परियोजनाओं को रद्द किया तथा सरकार की घोषणा सम्बन्धी पत्र तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के हाथों प्रो. अग्रवाल को भिजवाया था । इस पत्र में गंगा की रक्षा के लिए हरसंभव उपाय करने का आश्वाशन प्रो. अग्रवाल एवं देश से किया गया था| 19 दिसंबर, 2011 को संसद में भी गंगा के उपर जबरदस्त बहस हुई थी । इस जीवंत बहस में तमाम राजनितिक प्रतिबद्धतता से ऊपर उठते हुए सभी सदस्यों ने गंगा के सांस्कृतिक महत्व को स्वीकारते हुए इसके रक्षा हेतु सरकार से हरसंभव उपाय करने और गंगा के रक्षा की मांग की, जिसके बाद सरकार की तरफ से जयंती नटराजन ने सदस्यों के द्वारा उठाये गये मुद्दे के प्रति अपनी सहमती जताते हुए ठोस कदम उठाने का भरोसा देश को दिया था | परन्तु बांधों से मुक्त रखने के साथ साथ गंगा को राष्ट्रिय ध्वज जैसा सम्मान और राष्ट्रिय पशु-पक्षियों की तरह संरक्षण देने की गंगा प्रेमियों की मांग आज तक अधूरी ही है और गंगा को लेकर सरकार की उदासीनता लगातार बरक़रार है | गंगा के लिए बने गंगा प्राधिकरण(नेशनल गंगा रिवर बेसिन ऑथोरिटी ) की मात्र २ बैठक पिछले ३ साल में हुई जिसमे २-३ घटे ही चर्चा हो पाई | प्राधिकरण अनेवालें दिनों में किसी निर्णय तक पहुंचेगा, इसकी संभावना भी नहीं दिखाई देता| सरकारी लाल फीताशाही गंगा के मामले में भी स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा है जिसमे गंगा के प्रति सरकारी प्रतिबद्धतता की पोल खुलती दिखा रही है| 
                                            गंगा को लेकर सरकार की नीतियों में बदलाव की गुंजाईश देश स्वामी निगमानंद के बलिदान के बाद देख रहा था। परन्तु सरकार द्वारा बलिदान को भूल अलकनंदा नदी पर बांध बनाने की अनुमति देने से गंगा रक्षा को लेकर सरकार से प्रभावी कदम उठाने की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है |
आज स्थति यह है कि गंगा को नजदीकी से देखने और उसके मातृत्व भाव को फिर से अनुभूति करने पर महसूस होता है कि मानों कुछ कह रही है गंगा | लग रहा है कि कलकल गायन की स्वर लहरी, अविरल प्रवाह में सदियों से प्रवाहित, भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पहचान और जीवनदायनी "गंगा" अपने ही प्राणों की भीख मांग रही है|  बड़े-बड़े बांधों और अवैध खनन के कारण मोक्षदायनी गंगा अपने उदगम स्थल देवभूमि उत्तरांचल में ही दम तोड़ती हुई देखी जा सकती है | मैदानी इलाकों में सिचाई के नाम पर नहर निकालकर और पहाड़ी इलाकों में बांध बना गंगा को सुखाकर बिल्डिंग बनाने का षड़यंत्र रचा जा रहा है । आखिर पिने वालें पानी से ही कपड़े साफ करने व सिचाई  करने और बिजली पैदा करने की कोशिश क्यों की जा रही है जबकि अनेक नदियों का पानी बाढ़ के रूप में बह जा रही है और मनुष्य का दुश्मन बन गयी है ? सारे नालें गंगा में ही जाकर मिल रही है लेकिन इस दिशा में कुछ ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे और न ही गंगा की सफाई की योजनाये धरातल पर उतरती दिख रही है । सिर्फ और सिर्फ बांध बनाने की जिद पर सरकार अड़ी हुई है।  गंगा पर बांध बनाने से विकाश होने की दलील भी खोखली है क्यूंकि इसमें क्षेत्र के विकाश के वजाए भ्रष्ट नेताओं व माफियाओं के विकाश और प्रकृति के विनाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हुआ। इस बात की पुष्टि तमाम सर्वेक्षणों को देखने से मालूम पड़ती है । जिस विकाश का ढोल पीटकर बांध बनाये गये उससे देश को न तो कुछ मिला और न ही कुछ मिलने जा रहा है, सिवाए कुछ मेगावाट बिजली उत्पादन करने में ११५ किमी गंगा को सुखाने के । तमाम दस्तावेजों से यह सिद्ध हो चूका है कि बांध न तो भारी मात्रा में रोजगार पैदा करने में सक्षम है और न ही क्षमता के अनुरूप बिजली उत्पन्न करने में । उदहारणस्वरुप, 1984 में बनी मनेरी बांध-१ सौ लोगों को भी रोजगार देने में सक्षम नहीं है और पिछले १० वर्षों से अपनी कुल क्षमता(90MW) का 50% भी बिजली उत्पादन कर पाने में सफल नहीं हो पायी। लेकिन इसने गंगा की मूल धारा को समाप्त कर दिया और अनेकों लोगों को विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया । अंग्रेजों ने भी गंगा के प्रवाह को रोकने की योजना बनायीं थी परन्तु मदनमोहन मालवीय, कुछ राजाओं, शंकराचार्यों तथा जनता द्वारा विरोध किये जाने पर अँगरेज़ मंद पड़ गये थे तथा तमाम योजनाये रद्द कर दी थी । उस समय के तत्कालीन संयुक्त प्रांतीय मुख्य सचिव आइ.सी. एस.आर. बर्नस ने 20-04-1917 को गंगा के प्रवाह को मुक्त बनाये रखने सम्बन्धी एक आदेश (संख्या-१००२) जारी किया था तथा गंगा की रक्षा खातिर उपाय किये व तमाम परियोजनाए रुकवा दी । जिस गंगा पर शताब्दी वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने भी बांध बनाने की योजना रद्द कर गंगा का सम्मान किया हो, उसपर अपने ही लोगों द्वारा कहर बरपाना गंगा की महत्ता को अस्वीकार करने जैसा है। आखिर परमाणु समझौतें से देश को बिजली की समस्यायों से निजात दिलवाने के सरकारी वायदे कहाँ गए और विभिन्न देशों से युरेनियम खरीद बिजली पैदा करने का अस्वासन देश की जनता को देने के बाद भी गंगा से बिजली पैदा करने की बात क्यूँ की जा रही है ? कही बांध के नाम पर देश का धन लुटने की साजिश तो नहीं रची जा रही है ? क्या गंगा के बहाने देश की सभ्यता और संस्कृति के अन्त्योष्टि की तैयारी नहीं की जा रही है? सारी परियोजनाओं के बनाने के बाद भी देश की कुल आवश्यकता का १० प्रतिशत बिजली उत्पादन में भी गंगा के पानी उपयोग में नहीं लाये जा सकते तो फिर गंगा को सुखानें की तैयारी क्यूँ की जा रही है? 
                       देश की जनता इन् सवालों का जबाब चाहती है और माँ गंगा की रक्षा के लिए सरकार से ठोस कदम तुरंत उठाने की मांग करती है। देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 80 प्रतिशत हिन्दू जो दैनिक जीवन में हर पवित्र कार्य गंगाजल के इस्तेमाल से करता है और गंगा के प्रति अपार श्रद्धा और भक्ति का दिखावा तो करता है, परन्तु गंगा को बचाने की खातिर कुछ करने के लिए न तो उसमे प्रेरणा जग रही है और न ही वह चिंतित है | देश में गंगा के नाम पर राजनितिक रोटियां सेंकने वालें भी चुपचाप परिस्थितियों पर नज़र रख अपने राजनितिक फायदे नुकसान में ही लगी है| देश किसी भी सूरत में विकाश के नामपर गंगा की बलिदानी कतई स्वीकार करने को तैयार नहीं है । परिस्थितियों से मजबूर व मौन होकर लुटती गंगा मानों अपने रक्षा की खातिर बलिदान का आह्वाहन कर रही है, उसी तरह जैसे कभी भारत माता ने सैकड़ों बलिदानी युवकों से देश को आजाद करवाने के समय किया  था| आवश्यकता है युवाओं को आगे आने की और अपनी प्यारी गंगा मैयाँ की रक्षा के लिए समय निकालने की, ताकि उसके गोद में खेलने का मौका खुद के साथ साथ भावी पीढ़ी को भी मिल पाए| सभी देशवाशियों को मिलकर गंगा को बचाने का प्रयाश करना चाहिए | यह प्रो.अग्रवाल के समर्थन में नहीं बल्कि गंगा के प्रति अपना समर्पण जताते हुए किया जाना चाहिए व सरकार पर दबाब बनाना चाहिए जिससे मानव के कल्याण में बहती गंगा का कल्याण हो सकें | आखिर बिना गंगा के भारत की कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है ।

Tuesday, 10 January 2012

जातिवाद से प्रदूषित होती भारतीय राजनीति

आज़ादी  के  6 दशक बीत जाने के बाबजूद भी देश, व्यवस्थागत और सामाजिक चुनौतियों से निपटने मे व्यस्त है | आम जनता आतंकवाद, बढती बेरोजगारी, कमर-तोड़ महंगाई से परेशान है वही वह अपने बीच में व्याप्त सामाजिक समस्यायों से भी पीड़ित है | जातिवाद से प्रेरित राजनीति भी इन्ही समस्यायों मे शामिल है जिसने हमारे समाज को तो खोखला कर ही दिया है, राजनितिक व्यवस्था को भी प्रदूषित करने पर तुली हुई है| अधिकांश राजनीतिक दल व उनके नेता आम जनमानस के विषयों, यथा, आर्थिक व सामजिक समानता स्थापित करने, रोजगार दिलाने, भोजन, वस्त्र, आवास,शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने को ताक पर रखकर, जात-पात की राजनीति को हवा दे वोट बटोरने और सत्तासुख भोगने के फिराक में है |
आनेवालें दिनों में कुछ राज्यों में विधान सभा के चुनाव होने वालें है | सारे राजनितिक दल जातिगत राजनीति के इस घिनौने खेल का हिस्सा बनने में कोई हिचकिचाहट दिखाते नहीं दिख रहे है | राष्ट्रवाद का झंडा थामने का दंभ भरने वाली भाजपा हों, या सेकुलर होने का एकमात्र एकाधिकार रखने का हक समझनेवाली कांग्रेस पार्टी, सभी सत्ता पाने  की छटपटाहट में समाज को बाँटनेवाली नीतियों पर चल रहे है| राजनीतिक दलों  की सारी नीतियाँ, जातियों, जातीय समीकरणों और जातिगत जनसंख्या  के जोड़-तोड़ के इर्द-गिर्द ही बनती दिख रही है|  एक तरफ हम विश्व महाशक्ति बनने का अहंकारी दंभ भर रहे है, देश के चमकने और बदलने के नारे जोर शोर से लगाये जा रहे है, वही परदे के  पीछे बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थति देखने को मिल रही है | प्रगतिशील समाज के नित्य बदलते जीवन-शैली, विविधता में एकता के बंधते सूत्र ( रेलवे और शिक्षण संस्थाओं में बढ़ी नजदीकियां बिना किसी भेदभाव के) और तकनिकी व सुचना के इस दौर में भी पार्टियाँ समाज की पारंपरिक कमजोरीयों को सत्ता और पद लिप्सावश गलत इस्तेंमाल कर एवं उनकी भावनाएं भड़काकर, चुनाव जितने के जुगार फिट करने  में लगे है|   
दुर्भाग्यपूर्ण स्थति है कि  "देश के कुछ  राजनीतिक दल जातीय श्रेष्ठता और स्वीकार्यता के आधार पर सत्ता हथियाने का सपना पाले बैठे हुए है |"" बड़ी अजीब विडंबना है कि दुनिया को ज्ञान सिखाने वाला भारत सामाजिक दायरे मे सिमटी राजनीति का नमूना पेश करता है और अमेरिका जैसा देश गोरे-काले की भेद मिटाकर बराक ओबामा जैसे को अपना सबकुछ सौप देता है
युवा पीढ़ी के जिम्मे समाज में घुसी इस दीमक रूपी किट को अपने विचारों एवं तदनुसार व्यवहार और आचरण द्वारा  समूल नष्ट करने  जिम्मेवारी है जिसे उसने पिछले बिहार चुनाव में जातिगत मान्यताओं से ऊपर वोट देकर जतलाया था | भविष्य में वैचारिक क्रांति से जाति व्यवस्था पर आधारित गन्दी और विभाजक राजनीति को नष्ट करके भेदभाव रहित समाज के निर्माण एवं सविंधान के मजबूत सिपाही बनने हेतु युवाओं को आगे आना चाहिए | इतिहास दोहराने का मौका बार-बार नहीं मिलता| जाति के नाम पर राजनीतिक शुचिता को जिन्दा दफ़नाने वालें दलों को सबक सिखाना बहुत जरुरी है वरना जिन्दगी भर जाती के " जाता( गाँव में गेहूं पिसने वाली घरेलु उपकरण )"  में पिसते रहेंगे |

Monday, 9 January 2012

""बोल"" की लब आजाद है तेरे


महिला अधिकार के लिए समाज में हमेशा एक बहस चलती रही है |  धर्मिक विचारों को अपनी सोच का लेप चढ़ाकर और फिर उसे अपने ही रंग में रंगकर, अपने ही चश्में से देखना जब प्रारंभ हो जाता है तब महिला हमेशा ही आजीवन एक अघोषित जेल की कैदी बनकर रह जाती है और उसके सपने और अरमान मिट्टी के धुल बनकर धर्म के ठेकेदारों की तानाशाही आंधी में उड़ जाती है | इतिहास गवाह है कि संकीर्ण  दायरे में सिमटी विचारधारा और दकियानुशी सोच मे बंधी सामाजिक व्यवस्थाओं के कुछ अंधे अनुयायी महिलाओं को मिलने वाले प्रत्येक नागरिक अधिकारों को लेकर हमेशा हो-हल्ला मचाता रहे है | जब भी दुनिया में स्वतंत्रता और समानता पर आधारित समाज का निर्माण करने की बात चलती है तो हमेशा महिलाओं को दरकिनार कर उनकी महत्ता को नकार दिया जाता है | कुछ विशेष उदाहरणों( झाँसी की रानी, सुषमा स्वराज आदि ) को रटी -रटाई अंदाज़ में सुनाकर एवं  महिला सशक्तिकरण के जोरदार  नारे लगाकर आधी-आबादी  को तथाकथित कामयाब होने का प्रमाण-पत्र थमा दिया जाता है लेकिन परिस्थितियां बदलती नज़र नहीं आती | हम महिला अधिकार के नामपर  खुलेआम अपनी मनमर्ज़ी से  सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ने की वकालत नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें घर की दीवारों  से निकालकर समाज व देश के विकाश में हाथ बटाने का समर्थन कर रहे है | केवल चंद उदहारण गिनाने  एवं  विधानसभा और लोकसभाओं में सीटें आरक्षित कर देने भर से कुछ होने-जाने वाला नहीं जबतक की सर उठाकर जीने लायक माहौल न बना दिया जाये |
कल रात पाकिस्तान में प्रतिबंधित फिल्म ""बोल "" देखने के बाद  यही विचार मन में उमड़ रहे थे कि- वाकई महिलाएं आज भी अपनी चारदीवारी में सिमटी, दुनिया से दूर, सब कुछ खोकर सिसकियाँ भर रही है | पवित्र कुरान की आयतों का गलत ब्याख्या कर महिलाओं के ऊपर जुल्म करना क्या वाजिब है?  यह अलग बात है की यह किसी फिल्म की कहानी मात्र है परन्तुं  वास्तविकता से यह कोशो दूर नहीं बल्कि ज़मीनी हकीक़त की एक झलक जरुर प्रस्तुत करती है | प्रगतिशील मुस्लिम समाज के मानसिकता  को फिल्म ने बखूबी दिखाई है और हमें जरुर इसे स्वीकार करना चाहिए कि--- महिला सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन मात्र नहीं है बल्कि उसकी अहमियत और जरुरत उतनी ही है जितना पुरषों की | हमें आरक्षण की बहस से आगे बढ़कर सामाजिक बराबरी के सांचे में महिलाओं को उचित स्थान देना ही पड़ेगा | समय है हम उनकी वजूद को नकारने की वजाए मुख्यधारा में शामिल होने दें वरना क्रांति की मशाल थामें महिलाएं बहुत जल्द हल्ला बोलने वाली है | आग्नि  के ताप और सूर्य के तेज़ ज्यादा देर तक ढकना पसंद नहीं करते क्यूंकि उनकी प्रकृति ऐसा करने की उन्हें इज़ाज़त नहीं देती |

Monday, 21 November 2011

जो न कटे आरी से वह कटेगा बिहारी से।

 ठंड शुरू होने के साथ ही किस्म-किस्म की हिदायतों से सामना होता रहा है आपका। मौज में दी गयी हिदायतें कुछ इस तरह भी कि  "गर्म तासीर वाले मेवे का सेवन कीजिए" और फिर चलता है तो कुछ तरल पदार्थ भी आपके लिए उपलब्ध हैं। महंगाई की इस दौड़ में इन हिदायतों के सामने आने से आप थोड़ा गुस्से में जरूर आएंगे पर काहे का गुस्सा? इस मौसम में बिहार से जुड़े कुछ नारे और बिहार में उपजी कहावतों को सुनिए न, अपने आप आ जायेगी गर्मी।

सबसे पहले यह---- ""जो न कटे आरी से, वह कटेगा बिहारी से""। आरी और बिहारी वाले इस नारे का संबंध बिहार से जरूर है पर मजेदार बात यह है कि यह हिंदुस्तान और बिहार में नहीं चलता बल्कि पाकिस्तान में दौड़ता है। पाकिस्तान के करांची शहर में बिहार से गये मुसलमानों का काफी दबदबा है। वहां बड़ी हैसियत वाली पार्टी एमक्यूएम(MQM) में बिहारी मूल के नेताओं की संख्या अधिक है। चुनाव के समय पाकिस्तान में सिर्फ करांची में ही नहीं बल्कि अब कई इलाकों में भी यह नारा पूरी ताकत से गूंजता है कि "जो न कटे आरी से, वह कटे बिहारी से" । अब तो मलेशिया में भी इस नारे की जबर्दस्त अंदाज में ब्रांडिंग है। बिहारी कबाब वहां काफी लोकप्रिय है। बिहारी कबाब की ब्रांडिंग में इस नारे का खूब प्रयोग होता है। वह भी प्रीमियम क्वालिटी का कबाब। मस्त अंदाज में हैं बिहार में उपजी कुछ कहावतें। एक कहावत है----""" दमड़ी के बुलबुल टका चोथाई"""।  हिंदी में यह कहावत यूं बनती है --""नौ की लकड़ी नब्बे खर्च""। पर बिहारीपन लिए दमड़ी वाली कहावत भीतर तक जाती है। इसी तरह बिहार से उपजी एक कहावत है----"" बाप गले लबनी पूत के गले रुद्राक्ष""। बड़े मर्म के साथ है यह कहावत। बड़े स्तर पर व्यंग्य छिपा है इस बिहारी कहावत में। किसी भ्रष्ट व्यक्ति के पुत्र को सुना कर देखिए इस ठंड के मौसम में, फिर बिना गर्म तासीर वाले मेवे और तरल पदार्थ की गर्मी किस तरह से आती है। मौज भरे अंदाज में बनी इस बिहारी कहावत पर गौर कीजिए---"" सगरे खीरा खा के भेंटी तीत""। यानी पूरा आनंद ले लिया और आखिर में कह रहे मजा नहीं आया। संतोषी प्रवृत्ति किस तरह की है इस पर आधारित एक कहावत कुछ यूं है----""मार काट पिया तोरे आस""। यानी भला है बुरा जैसा भी है.। एक कहावत है---"" ठेस लगे पहाड़े, घर के फोड़ी सिलवट""।  यानी गुस्सा किसी और पर, निकले किसी पर। बिहार में उपजी कहावतों में समाज से जुड़े प्रसंगों को खास तौर पर जोड़ा गया है। सामाजिक विसंगति को दर्शाती एक कहावत है----""नोकरो के चाकर तेकरो लमेचर""। यानी नौकर के भी चाकर हैं उसके पास और यहीं चाकर के भी हैं सेवक|

आपको कैसी लगी अपनों की बोली और गाँव की भाषा को समर्पित यह लेख, जरुर बताये |(साभार --एक पत्रकार मित्र )

Saturday, 19 November 2011

पलायन -- अपनों से बिछड़ने का दर्द और गरीबी की आग

                       किसी ने कहा है कि   --   
जब पैसे की तंगी से थोड़ी सी चुभन भी होती है ,
जब जिन्दगी बदतर हालातो में, लाचारी का रोना रोती है,
जब अपनों की एक झलक को, आँखे उम्मीद खो देती हैं,
जब भावनाए माथे की धूल को, अपने आशुं से धो देती है,
................तब ह्रदय का कोना-कोना अपनों की यादों में रो देती है !!
अपना घर सबकों प्यारा ही होता है | घर घास फूस की बनी हों या फिर बड़े बड़े कमरों में आधुनिक साज सज्जा के साथ ईट का बना हुआ, अपनी चीज़े अपनी ही लगती है | सुकून पाने का ख्याल अपने घर में ही आता है, दुशरे के यहाँ नहीं | दिन भर के थकान के बाद अपने परिवार के साथ रहने का और समय बिताने का मन सबका रहता है | जिन्दगी चलाने की खातिर पैसे कमाने के लिए घर छोड़ने का मन किसी का नहीं होता, लेकिन कमबख्त गरीबी के कारण भूख से बिलबिला रहे अपने और अपने परिवार के पेट की आग शांत करने के लिए घर से निकलना ही पड़ता है | सारे सपने और अरमान की बहते आशुं  की घूंट पीकर भी लोग घर से निकल पड़ते है | अपनों की यादें समेटे और उनकी भलाई व  सुनहरे भविष्य के सपने बुनते लोग घर से एक अनंत यात्रा पर, बिना किसी लक्ष्य और पूर्वनिर्धारित उदेश्यों के चल देते है |  लोग कहते भी है कि गरीबों का कोई लक्ष्य नहीं होता,उन्हें जो भी परिस्थियाँ वर्तमान स्थति से बेहतर दिखती है, वही उनके लिए उपलब्धि के समान हो जाती है | मुखिया जी ने पैसे खर्च किये है चुनाव लड़ने में, उन्हें पैसे दिए बगैर गाँव में काम नहीं मिल सकता | यहाँ तो चाय पिने और पिलाने की औकाद भी नहीं बची तो काम के लिए देने खातिर घुस के पैसे कहाँ से लायेंगी जनता? सारी सरकारी योजनायें रेडियो में सुनने भर है, बदलते भारत की गूंजती आवाज़ सिर्फ सुनाई देती है, दिखती नहीं | अगर दिखती तो कहाँ बदला मुन्ना की किस्मत मनरेगा से ? वह आज भी अकेले अपनी बीबी और 2 बच्चों की खातिर सारा दिन काम करने में लगाता है, फिर भी परिवार में न तो सुकून है और न ही ख़ुशी ! वह भी अपने बेटों को इंजीनियर बनाना चाहता है, उसे भी यह देखते हुए बड़ा फक्र महसूस होता जब उसकी बिटियां डॉक्टर बनती, वह भी ख़ुशी-ख़ुशी सपरिवार मनाली घुमने और काशी दर्शन हेतु यात्रा करने का शौक पालें हुए है | लेकिन दो समय की भूख शांत करने और अपनी जिन्दगी जीने के लिए जद्दोजहद कर रहा है |    इस परिस्थिति में घर छोड़ना मज़बूरी हो जाती है, आखिर करेंगा क्या बेचारा, अगर उसे घर में(गाँव में ) परिवार चलाने लायक कोई काम नहीं मिलेगा तो ?  ये एक मुन्ना की कहानी नहीं बल्कि हर गाँव के मुन्ना जैसे लोगों की हकीक़त है | चुनाव के समय बड़े-बड़े दावें और नारें देकर नेता बनने वालें लोग नज़र आते है | नेता बनते ही अपने घर खुशहाल करने की फ़िराक में जनता की आम समस्यायों और उनकी दैनिक परेशानियो को भूल जाते है | जब नेता और नेतृत्व ही जनता की बेहतरी के लिए उपाय करना छोड़ दें तो क्या होगा ? जब आम जनता के नाम पर राजनीति करके और गरीबी हटाओं के नारे के साथ सरकार बनाने वालें ही आम जनता की सुध लेना छोड़ दें, तब परिस्थितियां भयावह तस्वीर दिखाती है | जिस मनरेगा की ढोल पीटकर वर्तमान सरकार दुबारा सत्ता में आई, उसी के सरकार में उसी ग्रामीण विकाश मंत्रालय की जिम्मेदारी सँभालने वालें मंत्री के क्षेत्र में, जब भारत निर्माण का तो पता नहीं ग्रामीण विकाश की उजालें तक कही नहीं दिखी, तब समूचे देश का अंदाज़ा लगाया जा सकता है | ग्राम स्वराज्य और ग्राम पंचायते अपने लक्ष्यों और उदेश्यों से भटककर और सत्ता के विकेंद्रीकरण का नाजायज़ फायदा उठाकर गाँव की भलाई की वजाएं ग्रामीण जनता के मानसिक प्रताड़ना का केंद्रबिंदु सा बन गयी है | सहकारिता आन्दोलन से भी देश का कुछ ज्यादा भला नहीं हो पाया जबकि कागजों पर सहकारिता की किरण 25  करोड़ भारतीय तक पहुंची हुई बताई जाती है | मजदूरी के पैसे बैंकों से मिलने के बाबजूद काम का उचित मेहनताना नहीं मिल रहा है | पलायन का दौर जारी रहने के पीछे ये भी कारण है | पलायन सिर्फ "लुट वाली योजनायें" चलाने से नहीं बल्कि "बेरोजगार जनता की समस्यायों के छुटकारा पाने वाली योजनायें" चलाने से होंगी,जिसके लिए सरकार तैयार नहीं दिखती |   चमकते, बदलते, सँवरते भारत की पहचान गरीब और गरीबी है, लेकिन शहरों की चकाचौंध में हम इसे देख नहीं पातें | आखिर सरकार भी तो यही चाहती है कि गरीब और गरीबी बरक़रार रहे देश में, नहीं तो किस आम आदमी के हाथ के भरोसे राजनीती करेंगे ? भारत माता की जय उस आम आदमी की जय से सुरु होती है जिसने अपनी जय के साथ साथ भारत माता की जय लगाने का भी सपना पाल रखा है | अंतर बस इतना है कि वह उस उत्साह और विश्वाश के साथ जयघोष लगाने में सामर्थ्य रखते हुए भी उसकी आवाज़ उसका साथ नहीं दे रही, क्यूंकि वह चमकते और विकसित होते भारत में भी अपनी मुलभुत आवश्यकताओं रोटी, कपडा, मकान की खातिर तरस रहा है ,उससे वंचित है | आर्थिक पैकेज देने के वायदे सिर्फ कागजों तक सिमटी है और विकसित आधारभूत सरंचना के काम भविष्य के सरकारों के ठेके छोड़ दिया गया  है | देश के नव-निर्माण के काम में लगने वालें युवा और आम जनता जबतक सड़कों पर भटकते फिरेंगे तबतक हम ""भारत निर्माण"" की खोखली नारे ही लगा सकते है | पलायन का अनसुलझी कहानी ग्रामीण जनता का काम के लिए पलायन तक ही नहीं खत्म होती, बल्कि यह प्रतिभाशाली युवाओं के देश छोड़ने तक जारी है | देश में सबकुछ गलत ही नहीं हो रहा है लेकिन बहुत कुछ सही भी नहीं हो रहा है- इस बात में कोई संदेह भी नहीं है | समय की जरुरत और परिस्थति की मांग है कि स्थति बदलने के लिए गंभीर, निर्णायक और त्वरित करवाई की जाएँ, अन्यथा आन्तरिक खतरे उत्पन्न होने के साथ साथ आर्थिक महाशक्ति बनने के सपने भी मुंगेरी लाल के हसीन सपने की तरह अधूरे ही रह जायेंगे, फिर देश में कोई कलाम भी नहीं बचेंगे जो उत्साहवर्धन करते हुए दिखाई देंगे|

इसी मुद्दे पर अख़बारों की रिपोर्ट  की लिंक - विशेष संपादकीयः रोजगार तो देते नहीं, योजनाओं से नाम तो हटाएं प्रधानमंत्री- http://www.bhaskar.com/article/SPLDB-special-editorial-on-unemployment-2573949.html ,भास्कर श्रृंखला: भाग 1- हर साल काम के लिए तीन करोड़ लोग छोड़ रहे हैं घर-- http://www.bhaskar.com/article/SPLDB-out-shorted-news-series-2572730.html?SL2=, भास्कर श्रंखला: भाग 2- हजारों करोड़ की 12 योजनाएं फिर भी स्थायी काम नहीं- http://www.bhaskar.com/article/SPLDB-thousands-of-crores-2575828.html?SL2=,

Friday, 18 November 2011

बिहार का सोनपुर मेला

वैशाली को दुनिया "लोकतंत्र की जननी" के तौर पर जानती है | बौद्ध धर्म ,आम्रपाली, लिच्छिवी गणराज्य, महावीर की जन्मस्थली, चार मुख वालें महादेव, हाजीपुर का केला के अलावे बहुत सारी चीज़े है वैशाली के पास जिसपर वैशाली-वाशी अपने को गौरवान्वित महसूस कर सके, लेकिन उन सब चीजों मे ऐतिहासिक,सामाजिक महत्व पर आधारित और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर लगने वालें विश्वप्रसिध "सोनेपुर मेला" वैशाली की खूबसूरती और ग्राम...ीण संस्कृति के बदौलत विकाश करने का अनुपम उदहारण प्रस्तुत करती है. शिक्षा और स्वास्थ्य को केन्द्रित गाँव में लगने वाला यह मेला समरसता का भाव पैदा करता है, दुर्भाग्य का विषय है मेला 9 नवम्बर से शुरु है लेकिन लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ चुप्पी थामें हुए है और बाकि तीनो बेबसी से इसे बर्बाद और खत्म होते देखकर भी मौन है |
सोनेपुर मेला केवल परम्परा नहीं बल्कि पौराणिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर लाये जाने के बिहार-गौरव का परिचायक भी है। आईये आपको दैनिक जागरण और बीबीसी कि नज़रों से मेले कि सैर कराते है |
Dainik jagran link on mela:-सिर चढ़कर बोला लोक कला का जादू- http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_8480581_1.html, ग्रामश्री मंडप में कलाकृति का अद्भुत नमूना- http://in.jagran.yahoo.com/news.../local/bihar/4_4_8490438_1.html, सोनपुर मेले में उमड़ी भीड़-http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_8467151_1.html, स्नान घाटों पर दिखा आपसी रिश्तों का महासंगम-http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_8470979_1.html, पंद्रह लाख श्रद्धालुओं ने लगायी नारायणी में डुबकी-http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_8471090_1.html,नारायणी नदी में गजराज ने की जल क्रीड़ा-http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_8471193_1.html,
हर उम्र के लोगों के लिए खास होगा सोनपुर मेला-http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_8461834_1.html http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2011/11/111118_sonepur_mela_gallery_psa.shtml , http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/12/101205_sonpur_fair_mb.shtml
....आईये इस ऐतिहासिक धरोहर को संजोये 
 

Monday, 14 November 2011

उजड़ते परिवार, सिसकती बचपन और बाल दिवस के मायने

बचपन में जब गाँव के स्कूल पढ़ने जाता था, तब एक पंक्ति जरुर गुनगुनाते हुए लोगो से सुनता था----"गइया बकरियां चरति जाये, मुनिया बेटी पढ़ती जाये " | लेकिन आज  न तो मुनिया बेटी को घर के काम करने लायक छोड़ा गया है और न ही पढ़ने लायक | मुनिया फैसन की दौर मे आगे बढ़ने के लिए लोन लेकर पढाई कर रही है, जिसके भविष्य का कोई पता नही |  पिताजी ज़मीन बेचकर लोन चुकता कर रहे है |.....इन सबके बीच उजड़ रहा है तो बस परिवार....आखिर नेहरु के जन्मदिन पर उजड़ते परिवार की ख़ुशी में बाल-दिवस मनाने के मायने क्या है जब ऐसी भयावह परिस्थितिया देश में मौजूद है ? ... दिन-ब-दिन महंगी और आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही है शिक्षा, बचपन के सपने (डॉक्टर,इंजिनियर, अधिकारी बनने के)  मिट्टी मे मिलते जा रहे है और जब बचपन सिसक-सिसक कर दम तोड़ रहा है , फिर भी हम बाल-दिवस क्यों  मना रहे है ?
नेहरु के चेलों ने तो शिक्षा के अधिकार कानून के माध्यम से पूरी शिक्षा व्यवस्था का भी मजाक उड़ाने का काम किया है और सर्व शिक्षा अभियान की कमर तोड़ कर इसे "शिक्षा के लुटेरे ठेकेदारों" के हाथो में सौप दिया है|...आम आदमी की बात कहकर सरकार चलने वालों के राज़ में शिक्षा जैसी चीज़े गरीब जनता से जब दूर होती जा रही हो, तब बाल दिवस वास्तव में अपने मायने खो बैठती है | वैसे भी काहे का बाल दिवस, जिसने बाल और उसके बचपन कि खातिर कुछ किया ही नहीं बल्कि उलटे उसके भविष्य को कश्मीर, चीन जैसी समस्यायों को जूझने के लिए छोड़ दिया  हो !

Sunday, 13 November 2011


शिक्षा के गिरते स्तर का एक नमूना ...इस विडियो को देखे
http://aajtak.intoday.in/videoplay.php/videos/view/64935/2/121/Phd-in-3-days-.html 


Wednesday, 2 November 2011

मोबाइल संदेशों पर से सीमाबंदी हटने तक फोरम अगेंस्ट ऑटोक्रैसी ऑफ ट्राई करेगी विरोध

ट्राई द्वारा व्यक्तिगत मोबाइल संदेशों (SMS ) की सीमा १०० से बढाकर २०० करने के फैसले का फोरम अगेंस्ट ऑटोक्रैसी ऑफ ट्राई स्वागत करती है | ट्राई से फोरम यह मांग करती है कि इस सीमाबंदी को जल्दी से जल्दी हटाये क्यूंकि इस सीमाबंदी से विद्यार्थिओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को काफी परेसानियों का सामना करना पड़ रहा है | फोरम ने देश में सर्वप्रथम इस फैसले से हो रही परेशानियो को लेकर ट्राई ऑफिस पर प्रदर्शन करके आम जनता को इस फैसले से हो रही समस्यायों कि तरफ ध्यान दिलाते हुए विद्यार्थिओं के प्रतिनिधिमंडल के साथ ट्राई अधिकारिओं को ज्ञापन सौप कर इस फैसले को तुरंत वापस लेने कि मांग की थी |

विदित हो की पिछले दिनों ट्राई ने अवांछित SMS को आने से रोकने के साथ-साथ व्यक्तिगत SMS भेजने की सीमा १०० तक सीमित करने का फैसला लिया | इस फैसले के विरोध में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने ट्राई के इस अलोकतांत्रिक ,अव्यवहारिक और तानाशाही फैसले के विरोध करने और व्यक्तिगत SMS की सीमाबंदी हटाने हेतु "फोरम अगेंस्ट ऑटोक्रैसी ऑफ ट्राई " नाम से एक फोरम बनाकर इस फैसले का लगातार विरोध कर रही है | दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय से शुरु हुआ विरोध दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्य कॉलेज मे, JNU, जामिया सहित ४ राज्यों में पहुँच  गयी थी तथा अभी भी फोरम के समर्थन में लोग लगातार आ रहे है |
ट्राई के इस पुरे फैसले में देश में हो रही तमाम लोकतान्त्रिक आंदोलनों को दबाने तथा विद्यार्थिओं की बढती सामाजिक सक्रियता कम करने की कोशिश नजर आती है | जिसके  विरोध में न केवल विद्यार्थी शामिल है बल्कि सामाजिक  कार्यकर्ताओं का सहयोग भी फोरम को मिल रहा है | महाविद्यालाओं में सामाजिक सक्रियता इस फैसले की वजह से बाधित हुई है जिसके कारण विद्यार्थिओं में काफी गुस्सा भी है |

फोरम ट्राई से मांग करता है कि वह व्यवसायिक संदेशों पर प्रतिबन्ध लगाये तथा ग्राहकों को उसकी पसंद की कोटि को अपने हिसाब से इस्तेमाल करने की सुविधा प्रदान करें | फोरम ट्राई से मांग करता की व्यक्तिगत SMS भेजने की सीमा तय करने की वजाए ग्राहकों को यह छुट दें कि वह असीमित सन्देश अपनी आवस्यकता के अनुसार भेज सके | फोरम ट्राई से जनभावनाओं का आदर करते हुए अविलम्ब इस फैसले को वापस लेने कि मांग करती है |
फोरम सीमाबंदी हटने तक अपना विरोध जारी रखेगा , जिसके अगले चरण में व्यापक पैमाने पर हस्ताक्षर अभियान चलाकर दूरसंचार मंत्री से मिलने के साथ साथ जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन करेगी |
भवदीय 
अभिषेक  रंजन - संयोजक -फोरम अगेंस्ट ऑटोक्रैसी ऑफ ट्राई
E-mail - arkumar87lsc@gmail.com,
Faculty Of Law
Delhi University. Delhi-7
Mob.-- +91-9717167232

Tuesday, 1 November 2011

ट्राई के फैसले से छात्रों में हर्ष , सीमा 500 बढ़ाने की मांग


"Forum Against Autocracy Of TRAI" ,जो ट्राई द्वारा व्यक्तिगत संदेशो को भेजने की सीमा १०० किये जाने पर विद्यार्थिओं द्वारा बनायीं गयी थी , की एक बैठक आज शाम Law Faculty दिल्ली विश्वविद्यालय मे हुई, जिसमे ट्राई द्वारा व्यक्तिगत सन्देश भेजने की सीमा बढ़ाये जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की गयी|  ट्राई के इस फैसले का आशिंक समर्थन करते हुए फोरम के सदस्यों  ने  कहा की २०० सन्देश सामजिक जीवन में सक्रीय लोगों के लिए बिलकुल ही अप्रयाप्त है, जिसकी सीमा कम से कम 500 तो करनी ही चाहिए थी . वैसे  फोरम की मांग है की यह सीमाबंदी किसी भी तरीके से जायज़ नहीं है, इसलिए इसे तुरंत वापस लिया जाये |  ट्राई द्वारा सीमाबंदी किये जाने के कारण सारी सामाजिक गतिविधियाँ पर बुरा असर पड़ा है जिसके कारण विद्यार्थिओं और सामजिक कार्यकर्ताओं में इस फैसले के ख़िलाफ काफी गुस्सा है | 
विदित हो की फोरम ने सर्वप्रथम व्यक्तिगत सीमाबंदी के ख़िलाफ पहले दिन से ही ( 27 सितम्बर ) दिल्ली विश्वविद्यालय में विरोध करना प्रारंभ किया था जिसके क्रम में पिछले २१ अक्तूबर को ट्राई मुख्यालय पर छात्रों के प्रदर्शन और ट्राई अधिकारी को ज्ञापन दिया गया था | 
 ट्राई का यह फैसला सराहनीय है लेकिन फोरम अपनी लड़ाई संदेशों की सीमाबंदी हटाये  जाने तक जारी रखेगी .
फोरम ट्राई से मांग करती है की वह व्यक्तिगत संदेशों की सीमा  को समाप्त करें तथा अवांछित संदेशों से मुक्ति दिलाने हेतु ठोस उपाय  करें .
बैठक में योगेन्द्र, नमन, कमलेश ,आदित्य ,अनुराग, प्रभात, आदर्श, ब्रिज, संतोष आदि शामिल थे . 

भवदीय ,
अभिषेक  रंजन, संयोजक -  Forum Against Autocracy Of TRAI

PRESS REALESE- "Forum Against Autocracy Of TRAI" a minor triumph over autocracy of TRAI


"Forum Against Autocracy of TRAI", a forum of students against new regulation of TRAI( where we cannot send more than 100 sms/day) , held a meeting in Law Faculty, Delhi University, Where the forum members welcomed the decision of TRAI of increasing the no. of sms in a day from 100 to 200. The forum members expressed their happiness over the decision of TRAI. It is significant to inform that "Forum Against Autocracy of TRAI" have began their first ground protest from Law Faculty, DU(27 Sept.,2011) to TRAI Office(21st oct.,2011) for increasing the no of individual sms. Forum however demanded that TRAI further should increase this limit of sms from 200 to unlimited, because 200 sms is not enough to satisfy the needs of daily users especially social activists, students and common people. TRAI should consider the sentiments of the people. 

Forum members also said that their protest will continue till TRAI  limitation called-off. Anurag, Yogendra ,Adarsh,Vikash Gautam, Prabhat, Anshu, Sanjay Jha, Aditya, Brij, Santosh were present in meeting




Regards
Abhishek Ranjan- Convener- Forum Against Autocracy of TRAI

Friday, 28 October 2011

Media coverage ( मीडिया के नज़रों में आन्दोलन )

दैनिक "नया इंडिया" अख़बार में छपी छोटी सी लेख :-


आन्दोलन से सम्बंधित पहली खबर दैनिक "अमर उजाला " में 27 सितम्बर, पृष्ठ संख्या -१२( राष्ट्रिय ख़बरों की पेज पर) :-


दैनिक "हिंदुस्तान" में 29 सितम्बर, पृष्ठ संख्या-5 पर  छपी खबर :-

दैनिक "नयी दुनिया" में २२ अक्टूबर को छपी खबर :-



दैनिक "राष्ट्रिय सहारा " में २२ अक्टूबर को छपी खबर :-
दैनिक "लोकसत्य " में 21 अक्टूबर को छपी खबर :-

दैनिक "जनसत्ता"  में 3 नवम्बर,पृष्ठ संख्या -4, को    छपी खबर :-


Saturday, 22 October 2011

व्यक्तिगत SMS की सीमाबंदी के ख़िलाफ प्रदर्शन, TRAI द्वारा नीतियों पर पुनर्विचार का आश्वासन

नयी दिल्ली ,21 अक्टूबर, शुक्रवार  

एक दिन में 100 एसएमएस भेजने की सीमाबंदी से संबंधित ट्राई के अव्यवहारिक और अलोकतांत्रिक फैसले के ख़िलाफ आज विद्यार्थियों ने  फोरम अगेंस्ट ऑटोक्रैसी ऑफ ट्राई(Forum Against Autocracy Of TRAI) के बैनर तले ट्राई मुख्यालय,रामलीला मैदान पहुँचकर अपना विरोध दर्ज कराया और तुरंत इस फैसले  को वापस लेने की मांग की .

विदित हो की ट्राई के इस नए नियमों से सामाजिक गतिविधियों में शामिल विद्यार्थियों के सम्मुख काफी संकट खड़े हो गए है , क्यूंकि नए नियम उन्हें ज्यादा से ज्यादा लोगो से संपर्क रखने में बाधक बन रही है . ट्राई के इस जनविरोधी फैसले में देश में चल रही लोकतान्त्रिक गतिविधियों को ठप करने और युवाओं की सक्रियता को समाप्त करने के तौर पर फोरम देखती है. विरोध प्रदर्शन के माध्यम से फोरम इस फैसले में छिपी अंदरूनी साजिश के बारे में जन-जागरण फैलाना चाहती है कि किस प्रकार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमलें किये जा रहे है. विरोध प्रदर्शन के दौरान ही ट्राई के अधिकारियों को एक ज्ञापन भी सौपा गया जिसमे उनसे व्यक्तिगत एसएमएस की सीमाबंदी तुरंत हटाने की मांग की गयी . ट्राई के अधिकारी जो ज्ञापन लेने आए थे, ट्राई मुख्यालय गेट पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों से मिलकर इस समस्या का जल्दी से जल्दी समाधान करने हेतु विचार करने का आश्वासन दिया. अधिकारीयों ने समय तय करके अपना पक्ष रखने हेतु फोरम के सदस्यों को बुलाने की भी बात कही.
विरोध प्रदर्शन में विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र अपना विरोध दर्ज कराने हेतु मौजूद थे. फोरम ट्राई द्वारा इस फैसले के वापिस लेने तक अपना विरोध जारी रखने का फैसला किया है,जिसके अगले चरण में देश भर के कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में संपर्क करने की घोषणा भी की गयी है, ताकि विषय को पुरे देश के विद्यार्थी समुदाय तक पहुचाया जा सके. फोरम समाज के अन्य प्रबुद्ध वर्ग, बुद्धिजिवियों, समाजसेवियों से भी इस फैसले के विरोध में फोरम द्वारा चलाये जा रहे अभियान के लिए समर्थन मांगेगा .
प्रदर्शन में मुख्य तौर पर कुंदन कुमार(JNU ), संतोष दुबे, बृजचन्द्र किशोर , योगेन्द्र, आशीष, आदर्श सिंह, आदित्य कुमार, कमलेश  मिश्र, शशांक ,सिद्धार्थ, अनुराग कुमार, अंशु सहित 36 विद्यार्थी मौजूद थे .

संख्या पक्ष में भले ही कमजोर हो लेकिन मुद्दे पर अधिकांश विद्यार्थियों का समर्थन हमें प्राप्त है .

कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें :-

         


                         ट्राई गेट पर विरोध कर रहे विद्यार्थी ( Students Protest @ TRAI gate)



                   
                          ट्राई अधिकारीयों से मुद्दे पर बातचीत (discussing on issue with TRAI officials)


                                  ज्ञापन (scan copy of memorandum)  


                     ट्राई कार्यालय द्वारा प्राप्त की गयी ज्ञापन की अधिकारिक पुष्टि (Official            acknowledgement by TRAI office) 

दिल्ली जैसे व्यस्त शहरों में भी अगर मुद्दा आधारित लड़ाई लड़ी जाये तो बिना पैसे खर्च करवाये भी  लोग साथ देते है..बहुत ही आभारी है उन सभी दोस्तों का जिन्होंने व्यक्तिगत जीवन के व्यस्त समयों में से कुछ समय इस विरोध प्रदर्शन के लिए निकाला, लेकिन सबसे ज्यादा धन्यवाद उन्हें जो किसी कारणवश आज शामिल नहीं हो पाए,लेकिन आशा है भविष्य में चलने वाली संघर्ष रूपी वाहन के सारथी जरुर बनेंगे. हमारा यह संघर्ष पाबन्दी हटने तक जारी रहेगा,ये फर्जी दलाली राजनीती करनेवालें व्यक्ति का बयान नहीं बल्कि इस मुद्दे को लेकर अंतिम समय तक लड़ने के फौलादी विश्वास से  भरे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों का अटल मानसिक  सामर्थ्य  बोल रहा है.  ट्राई के व्यक्तिगत एसएमएस के सीमाबंदी के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई भले ही मीडिया प्रायोजित न हो, आर्थिक दृष्टि से भलें कमजोर दीखता हों, बिना किसी भारी-भरकम प्रचार व्यवस्था और अन्य साधनों से लैस न हो,परन्तु यह तो तय है कि
 
                           "बात जब उठी है ,तब दूर तलक जाएगी.....

Monday, 17 October 2011

युवाओं को संकुचित करती ट्राई के नियम

हाल में ही दिल्ली में हुए आतंकवादी हमले के अगले दिन एक सन्देश मोबाइल पर  खूब आ रहा था कि,
 मातम छाया है शहर में, भरा भीड़ से है श्मसान ,
कोई पूछे तो कह देना , हो रहा है भारत निर्माण ".
                        
                      सुबह सुबह किसी के मोबाइल पर यह सन्देश निश्चित तौर पर उसके अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है.लेकिन अंतरात्मा को झकझोरने वाली ऐसे सन्देश अब आपके मोबाइल पर आने बंद हो गए है  क्यूंकि तथाकथित  आन्तरिक सुरक्षा और आम जनता की परेशानी को ध्यान में रखते हुए सरकार इसपर आंशिक प्रतिबन्ध लगा चुकी  है. अब आप अपने हितैषियों को खुद को पसंद आनेवालीअपने ख़ुशी को बढ़ाने वाली पार्टियों की निमंत्रण वाली, सामाजिक कार्यक्रमों में रूचि रखने वालों को, अपने किसी कार्यक्रम में निमंत्रण वाली सन्देश भेजने का अधिकार को खो चुके  है,क्यूंकि सरकार को यह लगता  है कि यह सब अप्रासंगिक और परेशानी का कारण है .
सरकार जनता का  ध्यान  देश मे  व्याप्त अन्य सभी मुद्दे की  तरफ से  हटाकर उसके मौलिक अधिकारों मे ही कटौती कर रही है. संपत्ति की अधिकार की तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार छिनने की जो साजिश चल रही है उसके तरफ जनता का ध्यान न होना चिंता का विषय है.

 कुछ साधारण सवाल उठते है इस स्थति में,जो सायद आपके मन में भी उठने चाहिए कि :---

*** आखिर  जिस सुरक्षा के नाम पर यह किया जा रहा है उसका मकसद ठीक है ?  Bulk SMS को  रोकने के नाम पर आम   मोबाइलधारको  पर  लगाई जा रही   यह बंदिश कही हमारी आवाज़ को दबाने की साजिश तो नहीं है ?
*** व्यापारिक(Commercial ) उदेश्यों से प्रेरित सन्देश अगर कोई नहीं देखना चाहता तो उसे मुक्ति मिलनी चाहिए लेकिन जिसका उदेश्य सामाजिक या आपसी विचारों का आदान-प्रदान करना है उसपर प्रतिबन्ध क्यूँ?  आखिर व्यापारिक उदेश्यों को लेकर सन्देश भेजने वाली कंपनियां अधिकतम सिम का उपयोग करके ग्राहकों को और अधिक परेशान नहीं करेगी ,इसका भरोसा कौन देगा ? व्यापारिक उदेश्यों को पूरा करने के लक्ष्य को लेकर भेजे जाने वाले संदेशो पर रोक लगाया जा सकता है, आम जनता के बीच संपर्क के सस्ता और सुविधाजनक माध्यम sms पर सीमाबंदी करना कहाँ  तक उचित  है ?
*** ग्राहकों को ऐसी सुविधा देने पर क्यूँ विचार नहीं किया जा सकता जिसमे उन्हें आप्शन चुनने की पूरी आज़ादी हो कि वह किसका सन्देश पढना चाहता है और किसका नहीं,वजाए सन्देश भेजने की प्रक्रिया को ही सीमित करने के उदेश्य से प्रतिबन्ध लगाने के ?
***  क्या यह आपसी संवाद को कम करके असामाजिक बनाने की दिशा में नहीं ले जायेगा  ?  युवा चाहे अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहे या सामाजिक दुनियादारी से मतलब रखे,कही न कही वह मोबाइल का उपयोग करता है , अब जबकि लक्ष्मण रेखा खीच  दी गयी है तब उसके खाली समय का दुरुपयोग नहीं होगा,ये कैसे माना जा सकता है
>>> इसकी क्या गारंटी है की इस प्रकार के प्रतिबन्ध लगाने से फालतू सन्देश आने बंद हो जायेंगे, जबकि सरकार अपने नियमों के द्वारा उन्हें छुट देने पर भविष्य में सोच सकती है ?  पैसे कमाने के लिए कंपनियां कुछ भी करने को तैयार रहती है ,फिर फालतू मैंसज नहीं आएंगे इसकी प्रमाणिक गारंटी कौन देगा ?
*** सामाजिक रूप से सक्रीय लोग जो अमूमन आर्थिक रूप से कमजोर होते है, उनकी आवाज़ को दबाने की यह साजिश तो नहीं   है ?  क्यूंकि MSG नहीं भेज पाने की दशा में वह कॉल कर पाने में ज्यादा सक्षम नहीं हो पाएंगे, इससे उनका सामाजिक सक्रियता अपने आप कम या खत्म हो जाएगी.
*** सरकार की इस संस्था का कहना है कि अधिकारिक छुट्टियों (15 अगस्त, 26 जनवरी आदी दिनों में) के दिन इस बंदिश में छुट मिलेगी तो क्या हम अधिकारिक छुट्टियों के ही दिन अपने मित्रोंपरिवार के सदस्यों और सुभचिन्तकों को सन्देश भेज पाने का अधिकार  पाएंगे ?  ध्यान रहे, अधिकारिक छुट्टियों के दिन सन्देश भेजने पर अधिक जेब ढीले करने पड़ते हैतो क्या किसी दिन विशेष को अधिकतम सन्देश भेजने की छुट का दूरसंचार कंपनियां नाजायज़ फायदा नहीं उठाएगी ?
>>> क्या यह हमारी मूल अधिकारों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण करने का षड़यंत्र तो नहीं है, जिसमे हमें दूसरों से सुरक्षा के नाम पर संवाद करने से रोका जा रहा है?
              
यह किसी वैसे युवा के मन में उठी विचार से ज्यादा सरोकार नहीं रखती जो अपनी महिलामित्र (गर्लफ्रेंड) को लगातार मैसेज न कर पाने  के दुःख से दुखित है बल्कि सामाजिक जीवन में सक्रीय सभी लोगो की व्यथा का प्रतिनिधित्व करती है. हम सरकार के सुरक्षा के दृष्टि से उठाये जा रहे हर कदम का समर्थन करते है, परन्तु इस तरह के तालिबानी निर्णय जबरदस्ती थोपने को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता क्यूंकिक्या पता वर्तमान निर्णय के लागु होने के बाद हमें यह भी आदेश मिले कि आप एक दिन मे 100 कॉल, 100 ईमेल नहीं कर सकते, क्यूंकि आजकल ब्लास्ट करने के बाद आतंकवादी ईमेल करके सूचनाये देते है तो मेल पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया जाए ?
ऐसे समय मे जबकि देश में कुछ लोगो का व्यवस्थागत कमजोरियों को दूर करने का आन्दोलन चल रहा है वैसे समय मे वर्तमान मंत्रिमंडल के सबसे काबिल मंत्री के मंत्रालय द्वारा लागु की जाने वाली इस योजना से कही न कही यह संदेह उठाना स्वाभाविक है कि देश में चल रहे जनतांत्रिक आंदोलनों को दबाने के लिए तथा युवाओं की बढती सक्रियता को कम करने का यह साजिश तो नहीं है ?
अगर आपको लगता है की वास्तव मे यह संवेदनशील मामला है तो सजग नागरिक होने के नाते इसका उचित निष्कर्ष निकलना जरुरी है की -क्या ऐसे ही आदेश हम झेलते रहेंगे?
सवाल १०० sms  भेजने या न भेजने की नहीं हैसवाल है- इस प्रकार के अघोषित प्रतिबन्ध क्यों?  क्या हम तालिबान में रहते है या चीन मेयह तय करना बहुत जरुरी है जहाँ आम आदमी को एक दुसरे से संपर्क करने के सबसे सरल माध्यम मोबाइल SMS (सन्देश) भेजने पर भी पाबन्दी लगायी जा रही है.

छात्र समुदाय और आम जन विशेषकर सामाजिक कार्यों में सक्रीय आम नागरिकों से अपील है कि इस बंदिश के ख़िलाफ चल रहे  आन्दोलन को अपना समर्थन व सहयोग दे. जबतक ट्राई  इस निर्णय को वापस नहीं लें लेती, तबतक विद्यार्थी अपना आन्दोलन जारी रखेंगे .